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हरिवंशराय बच्चन की नव वर्ष पर कविताएँ

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कैलाश बनवासी की कहानी 'बस के खेल और चार्ली चैप्लिन'

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निश्चित रूप से आज के दौर हम तकनीकी रूप से सबसे अधिक समृद्ध हैं। सोशल मीडिया पर अत्यन्त सक्रिय भी। लेकिन यह भी एक कड़वी हकीकत है कि हम संवेदना के स्तर पर लगातार पिछड़ते चले जा रहे हैं। मुझे तो इस बात का डर है कि आगे के दिनों में संवेदना महज किताबी शब्द बन कर ही न रह जाए। कैलाश बनवासी ने अपनी इस मार्मिक कहानी 'बस के खेल और चार्ली चैप्लिन' के माध्यम से कुछ ऐसे ही इशारे किए हैं जो हमारी लगातार क्षरित होती हुई संवेदनशीलता पर प्रहार करती है। दुखद तो यह है कि इसका शिकार भी वही लोग हैं जिन्हें हम श्रमिक नाम से जानते-पहचानते हैं। दुर्भाग्यवश तकनीक की तरह ही वे सोशल मीडिया से भी दूर हैं