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रवि भूषण पाठक

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गांगेय प्रदेश चुनाव 2012




भय और श्रद्धा के निमित्‍त
शायद पुरानों की तरह ही निर्धारित थे
यहॉ आदमी नहीं जाति रहते थे
कभी कभी मूल गोत्र टोला गुट भी
ये सांपों को पूजते थे
बिना पर्यावरण की चिंता किए
यद्यपि कई के बाप बेटे मॉ डँसे गए थे
पर निरपराध सांपों को भी कुचल डालते थे
छद्मफणिधर और र्निविष भुजंगों की पेट में बरछा डाल
घूमाते थे चौराहों पर
गांगेय प्रदेश के’धामन’ ,’हरहारा’
ढ़ोढि़या ,पनहारा
गांव पर खतरा भी गंगा से ही था
गंगापुर गंगा के पेट में ही तो था ससुर !
यद्यपि गांव जन्‍मा भी
गंगा के द्वारा लाई जलोढ़ों से ही
इसीलिए गंगा पूजी जाती थी
इस ऐतिहासिक विवशता के साथ
गंगा द्वारा लीलने के प्रयास के चिह्न गांव के चारों ओर फैले थे।
ब्राह्मण अपनी पौराणिक विद्वता के बावजूद
लैट्रिन की नाली गंगा में खोलते थे
ठाकुर महाभारतकालीन शांतनु की कथा को बार-बार कहते
आदि माता का तट ही उनके तमाम दुष्‍कर्मो के साक्षी थे
कायथों ने केवल बोलना लिखना ही जाना था
धीरे धीरे धीरे धीरे.............
अन्‍य जातियॉ कम सक्रिय थी
ये कविता उन्‍हीं कम सक्रियों की है
जिन्‍हें गंगापुर के मतदान केंद्र पर मतदान करन…

रेखा चमोली

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रेखा चमोली









रेखा चमोली का जन्म 8 नवम्बर, 1979 उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में हुआ। रेखा ने प्राथमिक से ले कर उच्चशिक्षा उत्तरकाशी में ही ग्रहण की। इसके बाद इन्होंने बी. एस-सी. एवम एम. ए. किया।


वागर्थ, बया, नया ज्ञानोदय, कथन, कृतिओर, समकालीन सूत्र, सर्वनाम,  उत्तरा,  लोकगंगा आदि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।


साथ ही राज्य स्तरीय पाठ्यपुस्तक निर्माण में लेखन व संपादन। शिक्षा संबंधी अनेक कार्यशालाओं में सक्रिय भागीदारी । कक्षा शिक्षण में रोचकता ,रचनात्मकता, समूह कार्य व नवाचार हेतु सदैव प्रयासरत।

सम्प्रति- अध्यापन


रेखा चमोली उन रचनाकारों में से हैं जो अपनी और अपनी संस्कृति की अहमियत बखूबी जानती पहचानती हैं. यही एक बेहतर कवि की खूबी होती है. उन्हें मालूम है कि पढ़ी लिखी नहीं होने के बावजूद स्त्रियाँ ही संस्कृति की वाहक हैं. आज की स्त्रियाँ 'आँचल में दूध और आँखों में पानी' वाली स्त्रियाँ भर नहीं हैं बल्कि विश्वास के साथ यह कहने वाली स्त्रियाँ है कि- 'हम पहाड़ की महिलाएं हैं/ पहाड़ की ही तरह मजबूत और नाजुक/ हम नदियां हैं/नसें हैं हम इस धरती की'. मुझे रेखा कि कविताएं …

अरुण माहेश्वरी

अकेलों की नयी दुनिया



‘टाईम’ पत्रिका के ताजा अंक (12 मार्च 2012) में ऐसी दस बातों का ब्यौरा दिया गया है जो “आपकी जिंदगी को बदल रही है”।  इनमें पहली बात है - अकेले जीना। परिवार परम्परा के बाहर ऐसा एकाकी जीवन जिसमें किसी संतति का स्थान नहीं होता। अमेरिका समेत विभिन्न विकसित देशों के आंकड़ों के जरिये इसमें बताया गया है कि किस प्रकार दिन प्रति दिन ऐसे सभी आगे बढ़े हुए देश के लोगों में बिना किसी परिवार के अकेले रहने की प्रवृत्ति जोर पकड़ती जा रही है। अमेरिका में 1950 में अकेले रहने वाले लोगों की संख्या जहां सिर्फ 40 लाख, अर्थात वहां की आबादी का 9 प्रतिशत थी, वहीं अब 2011 की जनगणना के मुताबिक इनकी संख्या बढ़ कर 3 करोड़ 30 लाख, अर्थात आबादी का 28 प्रतिशत हो चुकी है। इसमें दिये गये तथ्यों से पता चलता है कि ऐसे एकाकी लोगों की सबसे बड़ी तादाद स्वीडन में, 47 प्रतिशत है, फिर ब्रिटेन में 34 प्रतिशत, जापान में 31 प्रतिशत, इटली में 29 प्रतिशत, कनाडा में 27 प्रतिशत, रूस में 25 प्रतिशत, दक्षिण अफ्रीका में 24 प्रतिशत तथा केन्या, ब्राजील और भारत की तरह के विकासशील देशों में क्रमशः 15 प्रतिशत, 10 प्रतिशत और 3 प…

वंदना शुक्ला

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वन्दना शुक्ला ने प्रस्तुत आलेख 'अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस' के अवसर के लिए भेजा था। लेकिन होली की व्यस्तताओं और और इधर उधर की भागदौड़ के कारण यह लेख प्रकाशित नहीं कर पाया था। आलेख पढ कर ऐसा लगा कि यह तो आज के दौर में कभी भी प्रासंगिक है। और इसे ‘पहली बार’ के अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। वन्दना ने आज के समय में कविता और कहानी दोनो क्षेत्रों में बराबर का हस्तक्षेप किया है। इनके सुविचारित आलेख भी इनकी सुसम्पन्न दृष्टि का परिचय देते हैं। नारी की मुक्ति का प्रसंग हर समय के लिए एक यक्ष प्रश्न रहा है। पितृसत्तात्मक समाज में कदम कदम पर नारी को छोटी छोटी बातों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसे हर समय अपने परिवार के ही पुरूष सदस्यों के सन्देह का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह समस्या अगर नारी लेखन का मुख्य केन्द्र बनती है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।











नारी मुक्ति के संघर्ष में लेखिकाओं की भूमिका



'पुरुष स्वर्ग का प्रतिनिधि है,और सर्वोपरि है नारी उसकी आज्ञाकारिणी होती है' -(कन्फ्यूशियस)



ये नारी-पुरुष संबंधों की एक पुरातन व्याख्या है, पर क्या भूमंडलीकरन…

अमरकान्त जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार

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13 मार्च 2012 का दिन इलाहाबाद के साहित्यिक इतिहास में एक अविस्मरणीय दिन के रूप में याद किया जायेगा। इसी दिन ज्ञानपीठ दिल्ली छोड़कर लेखक के शहर इलाहाबाद आया और वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ पुरस्कार वरिष्ठ कहानीकार और हम सबके दादा अमरकान्त जी को दिया गया। इलाहाबाद संग्रहालय का ब्रजमोहन व्यास सभागार पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था। जितने लोग सभागार में अन्दर बैठे या खड़े थे उससे कुछ ज्यादा ही लोग बाहर खड़े थे। हिन्दी साहित्य की विभूतियॉ इस यादगार पल की गवाह बनी।


नामवर सिंह, शेखर जोशी, ज्ञानपीठ के आजीवन ट्रस्टी आलोक जैन, ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया, विश्वनाथ त्रिपाठी, दूधनाथ सिंह, रविभूषण, अखिलेश, राजेन्द्र कुमार, भारत भारत भारद्वाज, हरीश चन्द्र पाण्डेय, सूर्यनारायण, प्रणय कृष्ण, वाचस्पति, सन्तोष भदौरिया, अनिता गोपेश, नीलम शंकर, सन्ध्या निवेदिता, अंशुल त्रिपाठी, सुबोध शुक्ल, कुमार अनुपम समेत हिन्दी साहित्य की कई पीढ़ियां इस यादगार पल की साक्षी बनी।


इसी दिन शाम को दैनिक जागरण की ओर से जब राजेन्द्र्र राव जी द्वारा पुनर्नवा के लिए अमरकान्त जी पर एक आलेख तुरन्त लिख कर भेजने का निर्देश मिला त…

मार्कण्डेय जी

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मार्कण्डेय जी की ख्याति आमतौर पर एक कहानीकार की रही है लेकिन उनके कवि रूप से लोग कम ही परिचित हैं। ‘सपने तुम्हारे थे’ और ‘यह धरती तुम्हें देता हॅू’ जैसे काव्य संग्रह उनके कवि रूप के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। कविताओं की उनकी बेहतर समझ ‘कथा’ के सम्पादन में स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती थी। उनकी द्वितीय पुण्य तिथि 18 मार्च के अवसर पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी ही एक पसन्दीदा कविता जिसे वे प्रायः सुनाया करते थे।








चोर को चोर कहना



चोर को चोर कब नहीं कहना चाहिए
कभी मैंने पूछा था चाचा से
तब वे चुप रह गए थे
कल एकाएक अपनी धॅसी ऑखें
मुलमुलाते हुए बोले-
चोर को उस समय चोर नहीं कहना चाहिए
जब वह उॅची मेंड़ पर खड़ा हो
और उसके हाथ में लाठी हो
जब वह भाग रहा हो और सामने
ठाकुर की बखरी की अॅधेरी कोली हो,
जब गॉव का मुखिया उसे
अपना मौसेरा भाई कहता हो
जब वह राजा का मित्र या साला हो
अथवा अफसर अदना या आला हो
या गॉव का नाई हो
जिससे तुम्हें छिलवानी हो खोपड़ी
बाप के शुद्धक में
अथवा उसे भी जिससे कहीं
दबती हो तुम्हारी नस
उस प्रोफेसर को तो कतई नहीं
जो तुम्हारा परीक्षक भी हो,
उस औरत को भूल कर नहीं
जो गुण्डों अथवा डाकुओं की रखै…

गायत्री प्रियदर्शिनी

गायत्री प्रियदर्शिनी का जन्म 30 जून 1973 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ। एम. ए. करने के पश्चात प्रियदर्शिनी ने भीष्म साहनी के साहित्य में जनजीवन की अभिव्यक्ति विषय पर अपना शोध कार्य पूरा किया। सम्प्रति आजकल बदायॅू के ही एन. एम. एस. एन. दास पी. जी. कॉलेज के हिन्दी विभाग में अस्थायी प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य कर रही हैं। कथ्यरूप, कल के लिए, वागर्थ आदि पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताएं प्रकाशित हुई हैं।


गायत्री प्रियदर्शिनी की छोटी-छोटी कविताओं में भावों की गझिन अभिव्यक्ति सहज ही दिखायी पड़ती है। आज के जमाने के मोबायली इण्टरनेटी युग में नगर पालिका की टोंटी में बहते पतले से पतले होते जा रहे प्यार के खूबसूरत से बिम्ब में गायत्री ने जैसे बहुत कुछ कह डाला है। हमारे पास और सब कुछ के लिए समय तो है लेकिन जीवन के लिए जरूरी प्यार के लिए वक्त नहीं है। जीवन के लिए एक और जरूरी जरूरत आग को अलाव कविता में बेहतरीन ढंग से व्यक्त किया है जिसमें चूल्हे पर फदक रही दाल है। दिसम्बर की ठण्ड में जिन्दगी अनायास ही अलाव के पास अपने मैले कुचैले हाथों को सेकने के लिए चली आती है। संभावनाओं के साथ इस बार प…

संतोष अलेक्स

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संतोष अलेक्स की पहचान एक बेहतर अनुवादक की रही है. लेकिन वे एक बेहतरीन कवि भी हैं. अपनी भाषा मलयालम में कविताई करने के साथ-साथ संतोष हिंदी में भी बेहतर कवितायेँ लिख रहे हैं. लोक और अपनी मिट्टी से जुड़ाव संतोष की कविताओं में सहज ही देखा और महसूस किया जा सकता है. 'मिट्टी की कोई जात धरम नहीं होती/ जो भी गिरे वह थाम लेती है/ जैसे माँ बच्चे को थामती है' जैसी पंक्ति मिट्टी से जुड़ा रचनाकार ही लिख सकता है.








मिट्टी



गांव से शहर पहुंचने पर
मिट्टी बदल    जाती है
गमलों में सीमित है
शहर की मिटटी
गांव की मिट्टी चिपक जाती है
मेरे हाथों एवं पांवों में

मिट्टी को धोने पर भी
उसकी सोंधी गंध रह जाती है
मिट्टी सांस है मेरी
उर्जा है मेरी
पहचान है मेरी

मेरे पांव तले मिट्टी को
अरसों से बचाए रखा हूं
मिट्टी का न कोई जात है
न धर्म

मैं तुम
वह वे
जो कोई भी गिरे वह थाम लेती है
जैसे मां  बच्चे  को थामती है







सूखा




हंसिए, सरौते व खुरपियों में
जंग लग गयी है
हमरते हुए घर लौटते बैल
नहीं है अब
खेतों के सूखे मेड ढह गए हैं

क्यारियां सूख गयी हैं
फूल मुरझा रहे हैं
पीपल के पत्ते खामोश हैं
नान तेल लकडी…

प्रतुल जोशी

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पोनुंग पार्टी









अभी सो रही है पोनुंग पार्टी
बेख़बर, अलमस्त,
प्रातः की इस नव बेला में
जब सूरज अपनी ज़िम्मेदारी निभाता
उठ जाता है बहुत सबेरे
यहां देश के इस भू-भाग में
(जिसका नाम
सूर्य के ही एक पर्यायवाची के नाम पर
रख दिया था
किसी ने वर्षों पहले)
रात भर रही होंगी
नृत्य में मशगूल
वर्ष के यह चार दिन
आते हैं
इन सबके हिस्से
जब कोई नहीं कहता
कि उठो,
देखो सूरज चढ़ आया है
बस्ती के ऊपर
और तुम सब
सो रही हो अब तक
अलग-अलग बस्तियों(1) में
सक्रिय हो जाती है पोनुग पार्टी
अलग-अलग रंगों के गाले(2)
ढेर सारी मालाऐं
कमर में उगी(3)
हाथों में कोंगे(4)
किने नानी(5) को याद कर
मिरी(6) के बोलों पर
हाथों में हाथ डाले
शुरू कर देती हैं
सब मिल कर पोनुंग(7)
(घड़ी के पेंडुलम  सी
दांयें से बांयें
बांयें से दांयें हिलती
आगे बढ़ती)
दो लाइनें मिरी की
फिर उन्हीं लाइनों को दुहराती
रात भर
नृत्य करती है
पोनुंग पार्टी
क्या कहता है मिरी
क्या है
उसके अबूझ
बोलों का अर्थ
न जाने कितना समझती हैं
न जाने कितना बूझती हैं
बस नृत्य करती रहती हैं
रात भर
एक सी गति
एक सी लय
एक सा धैर्य
एक सा विचार
मालूम है सबको
आ पहुँचा है सोलुंग त्यौहार
नहीं है